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JNU - ... finger is somewhere, but pointing somewhere

JNU - ...है उंगली कहीं, पर इशारा कहीं तो कौन ग़लत है - फीस हाइक  के विरोध में खड़े जेएनयू के छात्र या उन छात्रों पर लाठीचार्ज़ करती पुलिस अगर आपके पास सामान्य बौद्धिक क्षमता भी है तो आप लाठीचार्ज़ करती पुलिस को ग़लत मानेंगे। तर्कों में विश्वास कम है और बौद्धिकता को अलविदा कह चुके हैं तो छात्र भी ग़लत दिख सकते हैं। पुलिस vs छात्रों की तस्वीर एक तरफ़ डंडे बरसाती पुलिस और दूसरी तरफ नारे लगाती छात्रों की भीड़ - इस तस्वीर में समाज के दो धड़ों को एक दूसरे का दुश्मन दिखाया गया है। जो बिग बॉस इस पूरे खेल को चला रहा है वो यही चाहता है कि समाज इन दो धड़ों में बँटे। क्योंकि जितना बँटवारा होगा, समाज उतना ही कमज़ोर होता चला जाएगा। और समाज की कमज़ोरी ही बिग बॉस की ताकत बनेगी। कैमरे पर बोलने से मना करने वाले कुछ पुलिसकर्मियों ने पहचान सुरक्षित रखने की शर्त पर बातचीत में स्वीकार किया है कि “सरकार और आला अधिकारी उनसे पाप करवा रही है।" एक पुलिसकर्मी ने कहा कि “बड़े-बड़े अधिकारी और नेता तो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए विदेश भेज देते हैं या बड़ी-बड़ी प्राइवेट यूनीवर्सिटी में भेज देते...

Educated society is not a burden but a boon

शिक्षित समाज बोझ नहीं वरदान है शिक्षा   पर   व्यय  -  जीडीपी   में   इज़ाफ़ा ढाका यूनिवर्सिटी में बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के एक प्रोफेसर ने शिक्षा पर व्यय और आर्थिक विकास के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन के बाद एक पेपर लिखा- ‘ पब्लिक   एक्सपेंडिचर   ऑन   एजुकेशन   एंड   इकोनॉमिक   ग्रोथ :  द   केस   ऑफ   बांग्लादेश .’ पेपर के मुताबिक शिक्षा के बजट में एक प्रतिशत की वृद्धि प्रति व्यक्ति जीडीपी में 0.34 फ़ीसदी इज़ाफ़ा लाती है।  अगर सरकार इस पेपर को पढ़ती और शिक्षित समाज के महत्व को समझती तो जेएनयू को लोगों की पहुँच से दूर करने की कोशिशें न होती। इस विश्वविद्यालय को कभी बदनाम नहीं किया जाता। कभी जिन लोगों को जेएनयू कुछ सैक्स का अड्डा दिख रहा था, आज उन्हीं और उन जैसे ही कुछ लोगों को यह विश्वविद्यालय मुफ्तख़ोरी का गढ़ नहीं लगता। पिछले कुछ दिनों से  JNU  में आंदोलन चल रहा है। आंदोलन की वजह - अलग-अलग मदों में फीस हाइक। छात्र-छात्राओं और एल्यूमिनाईज़ का कहना था कि इन ...