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पत्रकारों को गिरफ्तार करके किसान आंदोलन को कुचलने का ख्याब छोड़ दे मोदी सरकार

  एक ईमानदार पत्रकार की जिंदगी चुनौतियों से भरी होती है। उसकी पहली और बड़ी चुनौती है कि वह सच्चाई के साथ खबर को जनता तक पहुंचा सके। इसके लिए उसे बहुत मशक्तत नहीं करनी पड़ती क्योंकि जो दिख रहा उसे उसी तरह से पेश कर देना आसान है, कठित तो ये है कि खबर को घुमाकर, काट-छांटकर जनता के सामने इस उद्देश्य के साथ पेश करना कि वह गुमराह हो जाए। किसान आंदोलन में कुछ ऐसा ही हो रहा है। एक बड़ी संख्या काट-छांट के साथ खबर पेश कर रही है तो मुट्ठीभर लोगों की संख्या मुट्ठी बांधकर जो जैसा दिख रहा उसे वैसा पेश कर दे रही है।    पत्रकार मनदीप पुनिया   की गिरफ्तारी को देखिए। एक फ्रिलांस पत्रकार जो अपने शौक के लिए रिपोर्टिंग करता है। दो महीने से किसान आंदोलन को कवर करने के लिए सिंघु बॉर्डर पर मौजूद है,  29 जनवरी को करीब 60 लोगों की भीड़ हाथ में डंडे और पत्थर लेकर आती है और किसानों पर हमला करने लगती है। पुलिस उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश ही नहीं करती बल्कि उन्हें एक तरह से बैकअप दिया जा रहा था। अन्य मीडिया संस्थानों ने दिखाया कि आंदोलनकारियों के खिलाफ स्थानीय लोग गुस्से में है वह...

किसान आंदोलन - हिंसा तो पहले दिन से हो रही है, एक्शन क्यों नहीं लेती सरकार?

  हिंसा केवल लाठी भांजना, गोली चलाना नहीं होती। अपने अधिकारों का ग़लत प्रयोग करके दूसरों के अधिकारों का हनन भी हिंसा है। संस्थाओं के ज़रिए संविधान सम्मत संघर्ष की ग़लत छवि पेश करना भी हिंसा है। अपने ही देश के नागरिकों को कभी खालिस्तानी, कभी पाकिस्तानी, कभी गद्दार बता देना और आम लोगों के बीच इस राय को फैलाने की कोशिश भी हिंसा है।   लगभग 5 महीनों (2 महीनों से दिल्ली की सीमाओं में) से चल रहे आंदोलन की मांगों को लेकर अहंकारपूर्ण मौन भी हिंसा है। इन हिंसाओं पर तो कोई बात कर है नहीं रहा। चलिए उस हिंसा की बात करते हैं, जिसकी सब कर रहे हैं। पुलिस को धकियाया गया।   बैरिकेड्स तोड़े गए । तलवारें लहराईं गईं।   लाल क़िले पर जबरन कोई झंडा फहराया गया । ये सब हिंसा है और जो इसे हिंसा नहीं मानता वो ग़लत है। अब ये समझिए कि जब इतनी सारी हिंसा हुई, तो अगला कदम क्या होना चाहिए। पहचान करना कि हिंसा किसने की और क्यों की? जिनकी बात कोई नहीं कर रहा, वो हिंसा सरकार ने की और इसलिए की ताकि चन्द पूंजीपतियों को फ़ायदा पहुंचे। कानून पास करने का समय, तरीक़ा और बाद में आंदोलन के प्रति भाव ...

लाल किले पर खालसा का झंडा फहराने वाला दीप सिद्धू भाजपाई? 24 घंटे बाद भी गिरफ्तारी क्यों नहीं?

  पूरा देश 26 जनवरी को जब 72वां गणतंत्र दिवस मना रहा था तब करीब 10 लाख किसान 3 लाख ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में परेड कर रहे थे। दोपहर तक सबकुछ बढ़िया चला लेकिन अचानक स्थिति बदली और आंदोलन में किसानों व पुलिसकर्मियों के बीच झड़प शुरु हो गयी। ये सब हो ही रहा था तभी एक कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। प्रदर्शन में शामिल दीप सिद्धू ने   लाल किले की प्रचीर पर खालसा का झंडा फहरा दिया । ये एक ऐसी घटना थी जिसने गोदी मीडिया को मौका दे दिया और उसने पूरे आंदोलन को हिंसक बताने में लग गई, अपने घिनौने मंसूबों में वह कामयाब भी हो रही है। खैर बड़ा सवाल ये है कि ये   दीप सिद्धू है कौन ?  एक लाइन में कहूं तो ये भाजपा कार्यकर्ता है। जो   2019 के लोकसभा चुनाव में बॉलीवुड अभिनेता सन्नी देओल   के लिए प्रचार किया करता था। सन्नी देओल के लिए रैलियों में जनता को संबोधित करता और उनसे भाजपा को वोट देने की अपील करता। जैसे ही लाल किले पर खालसा का झंडा लगाने की खबर आई सन्नी देओल ने ट्वीट करके सफाई दी कि उनका और उनके परिवार का दीप सिद्धू से कोई...