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Who is at risk from the constitution?

किसे है संविधान से ख़तरा?   चुने हुए प्रतिनिधियों को होटल की चाहरदीवारी में क़ैद करके रखे जाने का ट्रेंड लगभग स्थापित हो गया है। सरकार बनाने से पूर्व   खरीद-फ़रोख़्त  को चाणक्यगिरी कहना  नयी बुद्धिमत्ता  हो गई है। संस्थानों का सरकार के हित में प्रयोग सामान्य समझा जाने लगा है।  गवर्नर और प्रेसीडेंट की छवि पूरी तरह से कठपुतली  वाली हो गई है। दलित घोड़ी चढ़े - तो पिटाई। महिलाएँ अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहनें - तो बवाल। विद्यार्थी शिक्षा के लिए आवाज़ उठाएँ - तो हो हल्ला। एक्टिविस्ट्स  जन सरोकार  के मुद्दों पर सरकार की आलोचना करें - तो शोर-शराबा। ये माहौल  संविधान दिवस  को अधिक प्रासंगिक बना रहा है। संविधान  का अनुच्छेद 15 कहता है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान राजनीति इन आधारों के साथ-साथ और बारीक आधार निकाल रही है विभाजन के लिए-बँटवारे के लिए। बँटवारा   अपने   चरम   पर पूर्वांचली, मराठा, गुजराती - जन्मस्थान के आधार...

Democracy does not die today, the corpse has suffered a few more

लोकतंत्र आज नहीं मरी, लाश को कुछ लात और पड़े हैं   महाराष्ट्र में   देवेंद्र फडणवीस   द्वारा सीएम पद का शपथ लेने के साथ ही लोकतंत्र की हत्या के संदेश सोशल मीडिया पर तैरने लगे। असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और न जाने क्या-क्या विशेषण इस घटना को दिए जा रहे हैं। लोकतंत्र की हत्या हुई कब? लोकतंत्र की हत्या हुई । ये ख़बर अब आम हो गई है। इसलिए इस ख़बर के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देना ज़रूरी हो गया है। ख़बर सुनते ही मन में आना चाहिए कि हत्या हुई तो हुई पर हुई कब? अब जब सवाल उठ ही गया तो अंदर तक गोता लगाना चाहिए। और अंदर तक गोता लगाने पर पता चलेगा कि लोकतंत्र की हत्या बहुत पहले ही हो चुकी थी। ये तो बर्फ़ के बीच रखी लोकतंत्र की लाश है जिसे देख-देख हम ख़ुश होते रहते हैं।  कैसे हुई लोकतंत्र की हत्या? जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी, बिहर में राजद और जेडीयू, उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा - क्या ये गठबंधन ज़िंदा लोकतंत्र में स्वीकार्य होते? एक राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में तोड़ देने पर विपक्ष की लगभग चुप्पी क्या ज़िंदा लोकतंत्र में स्वीकार्य होता। लाखों युवाओं की बेरोज़गारी, अर...

JNU - ... finger is somewhere, but pointing somewhere

JNU - ...है उंगली कहीं, पर इशारा कहीं तो कौन ग़लत है - फीस हाइक  के विरोध में खड़े जेएनयू के छात्र या उन छात्रों पर लाठीचार्ज़ करती पुलिस अगर आपके पास सामान्य बौद्धिक क्षमता भी है तो आप लाठीचार्ज़ करती पुलिस को ग़लत मानेंगे। तर्कों में विश्वास कम है और बौद्धिकता को अलविदा कह चुके हैं तो छात्र भी ग़लत दिख सकते हैं। पुलिस vs छात्रों की तस्वीर एक तरफ़ डंडे बरसाती पुलिस और दूसरी तरफ नारे लगाती छात्रों की भीड़ - इस तस्वीर में समाज के दो धड़ों को एक दूसरे का दुश्मन दिखाया गया है। जो बिग बॉस इस पूरे खेल को चला रहा है वो यही चाहता है कि समाज इन दो धड़ों में बँटे। क्योंकि जितना बँटवारा होगा, समाज उतना ही कमज़ोर होता चला जाएगा। और समाज की कमज़ोरी ही बिग बॉस की ताकत बनेगी। कैमरे पर बोलने से मना करने वाले कुछ पुलिसकर्मियों ने पहचान सुरक्षित रखने की शर्त पर बातचीत में स्वीकार किया है कि “सरकार और आला अधिकारी उनसे पाप करवा रही है।" एक पुलिसकर्मी ने कहा कि “बड़े-बड़े अधिकारी और नेता तो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए विदेश भेज देते हैं या बड़ी-बड़ी प्राइवेट यूनीवर्सिटी में भेज देते...

Educated society is not a burden but a boon

शिक्षित समाज बोझ नहीं वरदान है शिक्षा   पर   व्यय  -  जीडीपी   में   इज़ाफ़ा ढाका यूनिवर्सिटी में बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के एक प्रोफेसर ने शिक्षा पर व्यय और आर्थिक विकास के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन के बाद एक पेपर लिखा- ‘ पब्लिक   एक्सपेंडिचर   ऑन   एजुकेशन   एंड   इकोनॉमिक   ग्रोथ :  द   केस   ऑफ   बांग्लादेश .’ पेपर के मुताबिक शिक्षा के बजट में एक प्रतिशत की वृद्धि प्रति व्यक्ति जीडीपी में 0.34 फ़ीसदी इज़ाफ़ा लाती है।  अगर सरकार इस पेपर को पढ़ती और शिक्षित समाज के महत्व को समझती तो जेएनयू को लोगों की पहुँच से दूर करने की कोशिशें न होती। इस विश्वविद्यालय को कभी बदनाम नहीं किया जाता। कभी जिन लोगों को जेएनयू कुछ सैक्स का अड्डा दिख रहा था, आज उन्हीं और उन जैसे ही कुछ लोगों को यह विश्वविद्यालय मुफ्तख़ोरी का गढ़ नहीं लगता। पिछले कुछ दिनों से  JNU  में आंदोलन चल रहा है। आंदोलन की वजह - अलग-अलग मदों में फीस हाइक। छात्र-छात्राओं और एल्यूमिनाईज़ का कहना था कि इन ...

To give equal rights to dumb wrestler, Rishi Venkariya will awaken the youth

गूंगा पहलवान को समान अधिकार दिलाने, युवाओं को जागृत करेंगे रुषि वेंकारिया   गूंगा पहलवान के नाम से मशहूर मूक और बधिर रेसलर वीरेंद्र सिंह के संघर्ष को देख हिंदूवादी नेता रुषि वेंकारिया ने मीडिया से बातचीत में बताया कि वे बहरी हो चुकी सरकार के कानों तक एक गूंगे पहलवान की आवाज़ को पहूंचाकर रहेंगे. रुषि वेंकारिया ने बताया कि दूसरे आम खिलाड़ियों के मुकाबले मूक और बधिर खिलाड़ियों की सुविधाओं में सरकार की ओर से कितनी लापरवाही की जा रही है. इस गंभीर मुद्दे को सरकार की नज़रों में लाने के लिए रुषि सभी आम जन का साथ चाहते है. क्या बापू को विस्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं नरेंद्र मोदी? दरअसल, पहलवान वीरेंद्र सिंह सभी मूक खिलाड़ियों के हक की आवाज़ उठा रहे हैं. वीरेंद्र की मांग है कि सरकार विकलांग खिलाड़ियों को वह सभी सुख-सुविधा मुहैया कराए जो वह बाकी आम खिलाड़ियों को देती है.  इसी मांग के चलते वीरेंद्र सिंह ने खेल मंत्री किरण रिजिजू को एक पत्र भी लिखा है. इस पत्र के ज़रिए उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से सरकार से अपनी मांगो को पूरा करने की पेशकश की है. पत्र में वीरेंद्र ने कुल च...

Amid the Chest Thumping Politics Over Odd-Even, Will Delhi Get Rid of Pollution?

Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal on Friday announced the return of Odd-Even scheme in Delhi. He announced that from 4th to 15th November the Delhi government will implement the odd-even scheme in Delhi to tackle the rising pollution levels in Delhi. The government has chosen to re-implement the Odd-Even scheme in November only because in that month farmers burn crops in the neighboring states of Punjab and Haryana. Due to which Delhi becomes a gas chamber.  Read More:   Do we all need Modi's 'FIT' Pill? Let us tell you that the odd-even scheme was first implemented in the year 2016. The first phase of this scheme was implemented from 1st -15th January 2016, the second phase was implemented from 15th April to 30th April 2016.  What is the Odd-Even Scheme? The odd-even scheme is a car rationing scheme. Under this scheme cars with license plates ending in an odd and even number are allowed on roads on alternate days, except weekends.  This means cars w...

Santosh Gangwar remarks about employment is to command youth

संतोष गंगवार ने क्यों कहा कि रोज़गार के अवसरों की नहीं बल्कि उत्तर भारतीयों में योग्यता की कमी! संतोष गंगवार   साहब ने कहा है कि नौकरियों की कमी नहीं है बल्कि उत्तर भारतीयों में योग्यता की कमी है। उनका यह बयान शासन चलाए रखने की प्रैक्टिस का एक हिस्सा मात्र है। दरअसल, ऐसा कहकर वो न केवल रोज़गार के मोर्चे पर विफल अपनी सरकार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि बेरोज़गार युवाओं में सेंस ऑफ इनफीरियरटी (हीनता का भाव) भी विकसित करना चाहते हैं। एक बार यह सेंस (भाव) विकसित हो जाए तो सवाल खत्म हो जाते हैं। और सवाल खत्म तो शासन आसान। कमांड करने के लिए सेंस ऑफ इनफीरियरटी विकसित कराना ज़रूरी समाज में भगवान को लेकर भी यही सेंस डिवेलप कराया जाता है। इस सेंस ऑफ इनफीरियरटी से सेंस ऑफ इनसिक्योरिटी विकसित होती है औऱ यहीं उस आधार का निर्माण होता है, जो समूह विशेष पर कमांड करने के लिए ज़रूरी है। बचपन से ही इस प्रक्रिया को महसूस किया जा सकता है। बेटा…वहाँ मत जाओ..वहाँ भूत है…बाहर मत जाओ…बाहर बाबा लोगो बच्चा उठा के ले जाते हैं। - इस तरह की बातों से बच्चों में असुरक्षा की भावना डाली जाती है। ...