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अर्नब गोस्वामी पत्रकार के भेष में सरकारी दलाल बना और भारतीय शहीदों की शहादत पर भी जश्न मनाने से नहीं चूका

  अर्नब गोस्वामी को लेकर लोगों के भीतर जो थोड़ी बहुत इज्जत बची थी वह भी   वाट्सऐप चैट लीक   मामले के बाद खत्म हो गई। ऐसा हम नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर उन लोगों के कमेंट बता रहे हैं जो पिछले करीब एक साल से अर्नब बनाम कौन पूछ रहे थे। लेकिन कुछ सवाल आज भी पूछे जाने बाकी हैं, पहला ये कि इतने बड़े खुलासे के बाद भी   मीडिया में चुप्पी क्यों है ? आखिर अर्नब से मीडिया कितना डरता है? क्या यहां भी सरकार के साथ अर्नब का गठजोड़ बाकी के संस्थानों को बोलने से मना करता है? क्या उनके भीतर ऐसी क्षमता नहीं कि वह खुलकर अर्नब के खिलाफ बोल सकें?   पार्थो दास गुप्ता के साथ हुई बातचीत का जो   वाट्सऐप चैट वायरल हुआ   उसमें अर्नब एक जगह इंडिया टीवी के वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा व टाइम्स नाऊ की प्रमुख पत्रकार नविका कुमार को कचरा बोलता है, फिर भी दोनो पत्रकारों ने किसी तरह से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। रजत शर्मा ने 16 जनवरी को ट्वीट करते हुए लिखा- 'चुप हुँ यूँ नहीं कि अल्फ़ाज़ कम हैं, चुप हुँ यूँ  कि अभी लिहाज़ बाक़ी है' इस ट्वीट को अर्नब के मामले से जोड़कर देखा जा रहा है, ऐसा क...

आखिर दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टरों ने कोरोना का टिका लगवाने से क्यों कर दिया मना?

  कोरोना महामारी के बीच 16 जनवरी 2021 का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। पूरे देश में एक साथ   वैक्सीनेशन का काम शुरु हुआ । हर राज्यों के लगभग हर जिलों में बूथ बनाए गए जहां लोगों को महामारी से बचाव हेतु टिका लगाया गया। भारत ने दो वैक्सीन को आपतकालीन मंजूरी दी है। पहली ऑक्सफर्ड-एस्ट्राजेनका की बनी कोविशील्ड और दूसरी भारत बायोटेक की कोवैक्सीन। कोविशील्ड भी देश के भीतर पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में बनी। कोविशील्ड को लेकर तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कोवैक्सीन को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं।    शनिवार को जब टिकाकरण की शुरुआत हुई तो दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने कोवैक्सीन का टीका लगवाने से मना कर दिया। अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टरों ने मेडिकल सुपरिटेंडेंट को एक चिट्ठी लिखी है उसमें उन्होंने लिखा- ' हमें पता चला है कि भारत बायोटेक की बनाई कोवैक्सीन को कोविशील्ड पर प्राथमिकता दी जा रही है, हम आपकी जानकारी में लाना चाहते हैं कि रेजिडेंट डॉक्टर्स भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के अधूरे ट्रायल को लेकर सशंकित हैं, मुमकिन है कि वे वैक्सीनेशन...

जन्मदिन विशेष : 65 बरस की मायावती आखिर क्यों तैयार नहीं कर सकी अपना विकल्प?

  Author :-   RAJESH SAHU उत्तर प्रदेश की राजनीति कभी भी एकतरफा नहीं चली। जब भी किसी पार्टी ने चुनाव जीता अगली बार वह सत्ता पाने के लिए संघर्ष करती नजर आई। लेकिन वर्तमान स्थिति पुराने इतिहास से अलग नजर आती है। भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव प्रचंड बहुमत से जीता और आने वाले चुनाव में भी वह अभी तक सारी पार्टियों से आगे नजर आती है। इसकी सबसे बड़ी वजह कुछ और नहीं बल्कि विपक्ष की सुस्ती है। 15 जनवरी को   मायावती   65 साल की हो गई। इसलिए ऐसा माना जा रहा कि 2022 यूपी विधानसभा उनके जीवन का आखिरी चुनाव होगा। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर तीन दशक से राजनीति में सक्रिय 4 बार की मुख्यमंत्री मायावती ने अपना विकल्प क्यों तैयार नहीं किया?   यह भी पढ़ें:  अखिलेश यादव: जिसे मील का पत्थर समझा गया वह राजनीति के 'ब्रेकर' पर आकर बिखर गए   कांशीराम जी ने 1981 में एक संगठन बनाया, जिसका  नाम रखा DS4, इसका नारा उन्होंने दिया 'ब्राह्मण, ठाकुर बनिया छोड़, बाकी सब हैं DS4'. यही DS4 अगले तीन साल बाद यानी 1984 में बहुजन समाज पार्टी में बदल गया। 1989 में बसपा ने यूपी विधानसभ...

जिन मुसलमानों ने देश की आजादी में सबसे आगे कुर्बानी दी उन्हें 'दोयम दर्जे' का नागरिक बनाने पर क्यों तुली है भाजपा?

  दोस्ती व भाईचारा के बीच कोई दीवार ना लाएंगे तुम राम नाम का जाप करों, हम दरगाह में चादर चढ़ाएंगे... क्या ऊपर लिखी छोटी सी दो पंक्तियाँ गलत हैं? क्या ये दो पंक्तियाँ हमें धर्म परिवर्तन करने को कह रही? क्या ये दो पंक्तियाँ एक सही कदम नहीं?   नए भारत में मुसलमानों की स्थिति बदल रही है, देश में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए हमेशा मौक़े की ताक पर रहने वाले कुछ तत्व उन्हें दबाने में लगे रहते हैं, बहुत ही सुनियोजित ढंग से RSS के अलावा सभी आवाज़ों को दबा दिया गया है।   इतिहास (भारत की आज़ादी से शुरुआत करते हैं) युसूफ मेहरली ही वो शख्स थे जिन्होंने 'Quit India' यानी भारत छोड़ो का नारा दिया था, ये वही नारा था जिसे गांधीजी ने 1942 में भारत की आजादी के लिए छेड़े गए सबसे बड़े आंदोलन के लिए अपनाया था। मुसलमानों ने भारत की आज़ादी में बहुत ही क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी, असहयोग आंदोलन की भी शुरुआत उन्होंने ही की थी, बैरिस्टर आसिफ अली ने भगत सिंह का केस तब लड़ा था जब कोई भी भगत सिंह का साथ देने को तैयार नहीं था, हसरत मोहानी वो शख्स थे जिन्होंने 'इंक़लाब जिंदाबाद' का नारा दिया था...

SC ने किसानों की समस्या का हल निकालने के लिए बनाई 4 सदस्य कमेटी, जानें-कौन हैं शामिल और क्या होंगे काम

  केंद्र सरकार के द्वारा किसानों के हक के लिए तीन कृषि कानून लाए गए, जिनके विरोध में किसान लगातार दिल्ली की तमाम सीमाओं पर प्रर्दशन कर रहे हैं. किसान लगातार सरकार से इन कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार किसानों की मांग सुनने को तैयार नहीं है. सरकार कानूनों को किसान हितैषी बता रही है कह रही है कि आने वाले दिनों में किसानों को इस कानून से काफी फायदा होगा   जैसा कि आप जानते हैं   किसान आंदोलन   की ये आग विदेशों तक जा पहुंची और मोदी सरकार के इस कानून की  निंदा की गई, लेकिन अपने अंहकार में डूबी मोदी सरकार ने किसी की नहीं सुनी ख़ैर किसानों की समस्या का हल निकालने के लिए बैठकों का दौर शुरू हुआ, अब तक सरकार और किसानों के बीच 9 दौर की बैठक हो चुकी हैं, इन बैठकों में  सरकार किसानों की मांग मानने को तैयार नहीं है, वहीं किसान सरकार के इस अंहकार को तोड़ने की पूरी कोशिश कर रही हैं. इन बैठकों में किसानों की 4 समस्याओं में से 2 पर सरकार अपनी सहमति दे चुकी है.   जिसमें इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2020,   दूसरा पराली प्रदूषण ...

पहले बिना मांगे कानून बनाया अब बिना मांगे कमेटी बना दी, क्या सरकार व सुप्रीम कोर्ट किसानों का भला चाहते हैं?

  11 जनवरी को केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों नए कृषि कानूनों के अमल पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने के साथ साथ एक कमेटी का गठन कर दिया है, ये   कमेटी   सरकार और किसानों के बीच जारी विवाद को समझेगी और अगले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इस   कमेटी में कौन लोग है   इसके बारे में हम आपको बाद में बताएंगे, पहले कुछ सवाल जो इस फैसले की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं।    11 जनवरी को जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई तो   चीफ जस्टिस अरविंद बोबड़े ने सरकार से कहा   था कि आंदोलन को लेकर आपका रवैया गलत है, अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो हमें कुछ करना होगा। असल में यही सबसे बड़ा पेच फंस गया, 11 जनवरी की शाम को किसानों ने प्रेस रिलीज जारी करके अपना मत स्पष्ट कर दिया। किसानों ने कहा- हम सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं कि उन्होंने किसानों की समस्या को संज्ञान लिया। लेकिन किसानों ने ये भी कहा, कि हमारी लड़ाई सरकार से है, हम किसी तरह की   मध्यस्थता नहीं चाहते , मतलब किसान सुप्रीम कोर्ट से किसी त...

पाकिस्तान द्वारा Balakot Airstrike में 300 लोगों के मरने की बात कबूलने की न्यूज निकली फेक, अब माफी मांगने में जुटी गोदी मीडिया

  मेरा नाम राजेश है। इसलिए मुझे रमेश या रितेश न कहा जाए। मेरे ऐसा कहने से लोग मान जाएंगे लेकिन भारतीय मीडिया नहीं मानेगा। इसने अगर रितेश कह दिया तो अपना नाम रितेश ही मान लो। 10 जनवरी एक हवा उड़ी, हवा ये कि   पाकिस्तान ने कबूल कर लिया कि सर्जिकल स्ट्राइक में उसके 300 लोग मारे गए । ये खबर जैसे ही सीमा पार करके भारत में पहुंची,   देश की धीर-वीर गंभीर मीडिया   ने लपक लिया। जितनी तेजी से लपका उतनी ही तेजी से उसे अबोध जनता की तरफ फेंक दिया गया।    सर्जिकल स्ट्राइक   कबूलने की बात जैसे ही सामने आई भाजपा समर्थकों की तो निकल पड़ी। मोदी मोदी मोदी। मेरा मोदी मेरा अभिमान। ये सब चल ही रहा था कि कुछ फैक्ट चेकर्स ने जश्न मना रहे लोगों को जैसे पीछे से धप्पा मार दिया हो। एक झटके मेें सारी हवा फुस्स हो गई। दरअसल हुआ ये था कि समाचार एजेंसी एएनआई ने एक आर्टिकल लिखा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक   जफर हिलाली ने 2019 बालाकोट एयरस्ट्राइक में 300 मौतों को स्वीकार किया है ।    एएनआई ने इस खबर के साथ एक वीडियो क्लिप लगाई थी, जिसमें फुटेज ...